मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

एक छत्तीसगड़ी व्यंजन -फरा।

छ्तीसगढ के बारे मे सब जानते है पर छत्तीसगढ़ के व्यंजनो के बारे लोग कम जानते है। आज हम बताते है एक छत्तीसगड़ी व्यंजन -फरा।खाने मे बहुत ही स्वादीष्ट और बनाने मे बहुत ही सरल।

सामग्री - १ कटोरी चावल आटा,नमक-स्वादानुसार,पानी गुंथने के लीये

तडके के लिये- ४ लाल खडी मीर्च, १छोटा चम्मच जीरा, १ चम्मच तेल।




विधी -सबसे पहले चावल आटा मे नमक डाल कर रोटी के आटे जैसे गुथ लें।उसे ५ मिनट के लीये रख दे। आटे की छोटी लोई बना कर छोटा छोटा लम्बा हाथ से चित्र मे दिखाये अनुसार बनाये। एक थाली मे तेल लगा कर रख दे। एक चौड़े बर्तन मे थोड़ा पानी डाले, इसी बर्तन मे एक कटोरी उल्टी रख दे। कटोरी के उपर फ़रा वाला प्लेट रखें। ध्यान दे कि पानी से प्लेट डूब ना जाये। अब बर्तन को आंच पर रख दे। बर्तन को ढंक कर फरा को भाप मे पकने दें। ढोकले की तरह इसे भपाने दें।


१० मिनट बाद फरा को चाकु लगा कर देखें कि वह चिपक तो नही रहा। यदि चिपक रहा तो थोडी देर ओर पकाये। अब तड़्के के लिये कढाई मे १ छोटा चम्मच तेल डालें। तेल गर्म होने के बाद जीरा और लाल खड़ी लाल खडी मिर्च से तड़का दे। इसमे फरा डालके हल्का सा सेकें।


आपका फ़रा तैयार है। अब उसे टमाटर लाल मिर्च की चटनी के साथ परोसें। बतायें कि फ़रा कैसा लगा?

रविवार, 8 मार्च 2009

शिक्षिका के रूप मे स्कूल आवागमन

मै पहले ही बता चूकी हूं कि मैं छत्तीसगड़ के कवर्धा जिले के दूरदराज के गांव के मानिकपुर के स्कूल मे पढ़ाती थी। अब मै आपको बता रही हू कि मै स्कूल आवागमन कैसे करती थी।
पहले दिन स्कूल मै अपनी मम्मी के साथ आई थी। उस समय बारिश का मौसम था, उस दिन स्कूल हम एक जीप से गये थे। स्कूल जाते समय जीप की जो हालत हो गयी थी उसे देख कर मुझे समझ नही आरहा था कि मै अपनी स्कुटी कैसे चलाउगी। मुझसे ज्यादा चिन्ता मम्मी को हो रही थी। वो मुझे इन खस्ताहाल सड़्को पर स्कूटी किसी हालत मे चलाने नही देना चाहती थी।
तब मम्मी ने कहा कि "यहां पर तुम साईकिल से ही स्कूल आना जाना करो।"
लेकिन मैं स्कूटी की ज़िद करने लगी थी ,पर मम्मी के सामने मेरी एक ना चली। सोचा चलो साईकिल ही चला लेते है।
रास्ता पहली बार देखा था पहले बस से १२ किलो मिटर पोडी गांव तक आओ, उसके बाद ५ किलोमीटर साइकिल से स्कूल जाना होगा। लेकिन क्या करे ? नौकरी करनी है तो करना तो पड़ेगा ही।
मेरे साथ एक सहकर्मी अध्यापक थे, वो पोडी गांव मे ही रहते थे। मैने उनसे कहा कि "अभी रास्ता ठीक से देखा नही है, पोडी से आपके साथ कुछ दिन जाउगी"
उन्होने कहा "ठीक है।"
अब हर दिन हम अपनी प्यारी फ़िलफ़िलि रेजर साइकिल से और मेरे सहकर्मी अपनी साइकिल से स्कूल जाते थे। पहले ही दिन वो मुझे रास्ते मे सब बताते जा रहे थे। अचानक एक ट्र्क मेरे सामने आया और मैंने साइकिल सड़क के नीचे उतार दी। ट्रक जाने के बाद जैसे ही मैने साइकिल उपर लायी,संतुलन बिगड़ा और धड़ाम ! हम निचे साईकिल हमारे उपर।
हमारे सहकर्मी घबरा गये। मानिकपूर उनके मामाजी का गांव था। उन्हे गांव मे डांट पड़्ने की आशंका थी। "कैसे इंसान हो मैडम का ध्यान भी नही रख सकते क्या ?" गुरूजी की इज्जत का फालूदा बन जाने का डर था।
मेरे माथे से खुन बहने लगा था। लेकिन मुझे और सहकर्मी अध्यापक को लगा कि चोट गहरी नही है। हम स्कूल की ओर पैदल ही चल दिये। स्कूल पहुचने पर मेरे सर मे दर्द बढ गया। कुछ समझ नही आ रहा था कि मै क्या करूं।
प्रधानअध्यापक जी स्कूल पहुंचे। उन्होने चोट पर टींचर आयोडीन लगाया। मैने उनसे कहा कि मुझे घर वापिस जाना है।
तब उन्होने गांव से किसी को बुलाया ओर मुझे घर तक छोड्ने को कहा।
मैने पूरी तरह ठीक होने के बाद ही दूबारा स्कुल जाना शुरू किया। पर उस सडक से ऐसे डरने लगी कि जैसे कोइ भुत हो। हमेशा के लिये एक डर सा बैठ गया मेरे मन मे। मै ही नही मेरे सहकर्मी और प्रधानाध्यापक भी मेरी साईकिल चलाने से डरते थे। जब हम लोग साथ मे आते थे,वो लोग मुझे बच्चो की तरह समझाते थे।
"अब साइकिल धीमी करो।"
"देखो सामने मोड़ है।"
"साइकिल से उतर जाओ, ट्रक आ रहा है।"
"ब्रेक लगाओ"
"घन्टी बजाओ"
स्कूल जाने की ये तो आधी कहानी है। साईकिल की सवारी से पहले मुझे १२ किमी बस की यात्रा भी करनी होती थी।
बोडला मे मेरी बुआ और बोड़लासे ५ किमी दूर बांधाटोला मे मेरे मामा (रवि रतलामी के छोटे भाई) रहते थे। मै मामा के घर मे रहती थी। मामा को सरकारी आवास मीला हुआ था। आवास के हाल बूरे थे। मामा तो विद्युत इंजीनियर थे लेकिन उनके घर मे दो सीवील इंजीनियर और थे ४ साल के मुदित और १ साल की रूनझुन। घर के प्लास्टर और दिवारो पर दोनो ने अपनी इंजिनियरींग की हुयी थी। मुदित के हथोड़े से पूरा घर हिलता था। और रूनझुन दिवारो पर पेंसील,कोयले और नाखुनो से नक्शे बनाती रहती थी। बांधाटोला मे रहने के लिये एक तो अच्छे घर नही थे दूसरे मामा का कार्यालय पास ही था, इसलिये मजबूरी मे वहीं पर रहना पड्ता था
मै अपने स्कूल के लिये सुबह ९.१० बजे निकलती थी। वहा पर १ बस उसी समय आती थी जो १२ किमी दूर पोडी जाती थी। १२ किमी के रास्ते के लिये बस कभी आधा घन्टा कभी पौन घन्टा लगाती थी। प्रायवेट जीप सेतो पूछीये ही मत ,वो तो एक घण्टे से लेकर २ घण्टे भी ले सकती थी। जीप के अंदर जितनी सवारी आ सकती हो उससे दूगनी सवारी लटकती हुयी जब तक सवार ना हो जाये हिलने का नाम ही नही लेती थी। लेकिन इन सबके चलते मुझे स्कुल १०.३० को पहुचना रहता था। पोड़ी के बाद हम और हमारी साईकिल।
अब वापिसी के हालात पुछीये ही मत। घर सही सलामत पहुंच जाओ वही गनीमत। स्कूल से साइकिल से पोड़ी पहुंचो। उसके बाद बस या जीप का इंतजार। कभी आधा घंटा , कभी एक घंटा। उसके बाद बस या जीप के चलने का इंतजार। ड्रायवर या क्लीनर का चिल्लाना "बस एक और सवारी मील जाये, चलते है।"
ऐसे मे एक दिन अचानक पता चला कि बोड्ला मे सड्के बन रही है। मेरे खुशी का ठीकाना ना था। जीप वाले भी कह रहेथे "अब तो दस मिनिट मे पोड़ी पहुंच जायेंगे। मैने ये खुशखबरी मामी जी को दी मामी जी भी खुश हो गई।
अब सड्को के बनने का काम चालु हुवा , सड़क बन भी गयी। उदघाटन भी हो गया। सामान्यत: सड़के निर्माण के बाद महिनो टीकी रहती है। लेकिन ये सड़क बनने के २ दिन बाद पहली बारीश मे बह गयी। निर्माण से पहले सड़क पर कही कंही कोलतार दिखायी देता था, अब वह भी दिखना है बंद हो गया। सड़क पर मिट्टी और गड्डो के अलावा और कुछ नही था। पहले सड़क मे गड्डे थे, अब गड्डे मे सड्क थी।
एक दिन रोज की तरह मै मै ९.१० को सुबह घर से निकली ओर बस का इतंजार करने लगी । उस समय बारीश का मौसम था हल्की बुदां बांदी भी चालु हो गयी थी। बस स्टैंड पर इंतजार करते हुये एक घंटा हो गया, बस नही आयी।
मै वापस घर गई और मामाजी से बस स्टैंड छोड़ देने कहा।शायद वहां से मुझे कोई जीप या बस मिल जाये। मामा जी के साथ मै बस स्टैंड गई वहा पर १ ही जिप थी। जिसमे कुछ लोग सवार थे। लग रहा था शायद जाने वाली हो क्योकि इन लोगो सवारी भरने के चक्कर मे और समय लगता है। मजबूरी मे मै उसी मे जाकर बैठ गई । जिप वाले ने पुछा कहा जाना है? मैने कहा मुझे पोडी जाना है। जीप वाले ने कहा ये गाडी अब पोड़ी के रास्ते से ना जाकर दूसरे रास्ते भोरमदेव से जायेगी। पोड़ी के रास्ते की सड़क खराब हो गयी है,जगह जगह पर गड्डे है इस्लीये अब गाडी भोरमदेव रास्ते से कवर्धा जाती है।
डाइवर ने मुझे बताया "वहां एक और एक जीप खड़ी थी है जो पोडी जा रही है। लेकिन किराया सामान्य किराये से दूगना ले रही है। जाना है तो उसमे बैठ जावो।"
मै सोचा क्या करें, स्कूल जाना तो है, भले ही दूगना किराया देना पड़े। अब क्या उस पर मै बैठ तो गई पर उसमे सवारी भरने समय तो लगना ही था। वहां से जीप निकलते आधा घण्टा और लग गया। लेकिन मुसीबत अभी खत्म नही हुयी थी। जैसे ही गाडी आधी रास्ते मे पहुची, विपरीत दिशा से दुसरा जिप वाला आया उसने गाडी रोककर हमारी जिप वाले से कहा "आगे मत जावो आगे बहुत गड्डा है गाडी फ़स जायेगी।"
हमारी जिप वाले ड्रायवर ने सभी लोगो को वहीं उतार कर कहा कि गाड़ी आगे नही जायेगी।
वंहा से पोडी ५ किलोमीटर था। मैने सोचा की अब पांच किमी पैदल, उसके बाद ५ किमी साईकिल से। बारह तो यहीं हो गये है। बारीश का मौसम है स्कूल पहुंचते तक तो छूट्टी हो जायेगी। मैने जिपवालो से प्रार्थना की थोड़ा ज्यादा पैसा ले लो लेकिन पोड़ी तक छोड़ दो। लेकिन कोई भी तैयार नही था। मेरे पास कोई चारा नही था। उसी जीप से मै वापिस घर आ गयी।
अब ये एक दिन कि बात नही थी रोज की ही बात थी। जिस दिन मुझे स्कूल जाने का सीधा साधन मिलता था,मै स्कूल पहुंचती थी। जिस दिन साधन नही उस दिन मजबूरन छूट्टी लेनी होती थी।
पता नही अब क्या हाल है वहां सड़को का। शायद अब हालात सुधरे हो। एक बात और मै जिस क्षेत्र की बात कर रही हूं वह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का चुनाव क्षेत्र है।

रविवार, 18 जनवरी 2009

मां बाप बहु और बेटे: कुछ विचार

माँ शब्द कितना प्रभावशाली है बच्चा जब अपने माँ कि गोद मे आता है तो सबसे ज्यादा शकुन महसूस करता है , उसके रोते चेहरे पर एक हँसी आ जाती है।
पर वही बच्चा बड़ा होकर अपने मम्मी पापा कि इज़्ज़त तो दूर कि बात है घर के एक कोने मे भी उन्हे रखने को तैयार नही होता है।
वृद्धाश्रम नाम सुना है इस नाम के सुनने से पूरा शरीर कांप उठता है ।
वो बच्चा बड़ा होकर उन्हे वहीं भेज देता है या अपने पास रखने को तैयार नही होता।
माँ और पापा शब्द बोलने ओर सुनने मे कितना अच्छा लगता है जैसे किसी भगवान का नाम। जरुरत नही भगवान की पूजा ना करें, इनकी पूजा करे तो चारों धाम मिल जायें।
वो अपने बच्चों को सारा समय देते है, खाने पीने से लेकर हर छोटी चीजों का ध्यान रखते है। कब अपने बच्चों कि सेवा करते करते बूढे हो जाते है। पर आज उनके बच्चों के लिये उनके पास समय नही।
अपनी भागदौड़ भरी जिन्दगी मे ऐसे खो जाते है कि दुनिया की सबसे अनमोल चीज को भूल जाते है।
सप्ताह मे एक बार माँ अपने बेटे के फोन का इंतजार करती है पर बेटा कहता "मैं काम मे फ़स गया था ।" अब सोचों बेटा के पास ऐसा कौन सा जरुरी काम रहा होगा कि वो ५ मिनट अपने मम्मी पापा को फोन नही कर सकता और तो और वो कहता है " बार बार फोन करके हमे परेशान ना किया करो।" कभी सोचा है उन्हे कितना बुरा लगता होगा पर वो अपने बच्चों से इतना प्यार करते है कि उनके बातों का वो बिल्कुल भी बुरा नही मानते।
अगर शादी के बाद बेटे कि तबियत अचानक खराब हो जाए उसकी बीवी अच्छे से देखभाल कर दे,तो बीवी कहेगी कि देखो आपके माँ पापा को आपकी परवाह नही
लेकिन उस बेटे को क्या पता इसके पहले बेटे कि तबियत खराब मे कितने रात उसके घर वाले सोये नही। बेटॆ को लगता है उसके मम्मी पापा उसकी परवाह नही करते।
अब इन सब बातों को ध्यान मे रखते हुये बेटा कहता है आप लोग ने मेरे लिये क्या किया।
एक बार बहु को उसकी सास ने साड़ी दी ,जब भी बहु आती उसकी सास उसे कुछ ना कुछ देती लेकिन बहु को लगता है हमे भी कुछ ना कुछ देना पड़ेगा।
इसलिये सास का कुछ देना बहु को बुरा लगता है लेकिन उस बहु को कौन बताये कि माँ को अपने बच्चों के लिये करना बहुत अच्छा लगता है और वो हमेशा करेगी उन्हे कोई नही रोक सकता किसी के मना करने से वो नही मानने वालो।
छोटी छोटी बातें कहा नही होती पर इसका मतलब किसी को कोई वृद्धाश्रम छोड़ दे या घर के किसी कोने मे उनके लिये थोड़ा जगह नही दे सकते।
अरे वो लोग इतना भी नही समझते कि आज जो कुछ वो है उनकी बदौलत है।
निंद अपनी भुला कर सुलाया हमको,
आंसू अपने गिराकर हंसाया हमको ।
दर्द कभी ना देना उस ख़ुदा कि तस्वीर को
ख़ुदा भी कहते है,माँ बाप जिनको।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

व्यंजन विधी : अंगूर के पत्तो के पकोड़े : -रवि रतलामी(मामाश्री) की रसोई से

बात उस समय कि है,जब रवि मामा राजनादगाव मे रहते थे। मैं लगभग ५ साल की थी और आंगन मे खेल रही थी । रवि मामा पता नही कौनसी पुस्तक मे खोये हुये थे। अचानक पेपर वाला आया ओर गॄहशोभा देकर गया। मौसी ने गॄहशोभा की ग्राहक थी और हर महीने पत्रीका आती थी। उस समय मौसी कालेज गयी थी। मामा ने नई पत्रिका देखी और पढन्ना शुरू कर दिया। अब मामा को कौन समझाये कि गॄहशोभा महिलाओ की पत्रीका है। अब हम उनके पत्रिका मनोहर कहानियां सत्यकथा तो नही पढते ना। लेकिन मामा तो मामा ठहरे, वे उसे पढने लगे। पढते पढते उनका ध्यान अगुर के पत्ते के पकोड़े की व्यंजन विधी पर गया। नानी के घर मे अंगूर का पेड़ था। अब हमारे मामा है तो खाने और बनाने के शौकिन । मै भी मामा की संगत मे चटोरी बचपन से ।
मामा ने पूछा "निशी एक नयी चिज खायेगी ।"
मै खेलते खेलते आई और बोली "क्या?"
"अंगूर के पत्ते के पकोड़े ।"
"उसे कैसे बनाते है?"
"चल अपन बना कर देखते है!"
मै मामा के पिछे हो ली चुकि गैस टेबल मेरे उचाई से काफी उचा था ,हमने टेबल की बाजू मे एक स्टूल लगाया और उसपर खड़े हो गये। हमे भी तो देखना था पकोड़े बनते कैसे है।
मामा ने अंगूर के पत्ते तोड़े ,धोये ओर बेसन घोला,उसमे नमक मिर्च प्याज डाला। मै सब देख रही थी। मुझे कुछ समझ नही आ रहा था। मै तो बस उसे देख रही थी ,और मामा उसे तल रहे थे। मै इतजार मे थी कि मामा उसे कब तले और हम उसे खाय़ें। हमे तो बस खाने से मतलब होता था बाकि तो क्या डल रहा है किसे मतलब बस !
अचानक रसोई मे नानी आई उन्होने पुछा "तुम दोनो क्या कर रहे हो ?"
मैने कहा "नानी चिंता मत करो आपको भी मीलेगा।"
मामा ने कहा "अंगूर के पत्तो के पकोड़े !"
नानी ने सर पकड़ लिया, उन्होने अपनी कभी अंगूर के पत्तो के पकोड़े का नाम भी नही सुना था।
अब मामा के हाथ से बने हुवे अंगूर के पत्तो के पकोड़े तैयार थे। हमने खाया, नानी को भी खीलाया, मौसी ने भी खाया ।
कैसे बने ये हम नही बतायेंगे ,आप खुद बनायें और कैसे लगे हमे बताये।
व्यंजन विधी : अंगूर के पत्तो के पकोड़े



सामग्री-
अगुर के पत्ते -४,५ मिडियम आकार के पत्ते,बेसन १ कटोरी,नमक स्वादानुसार
,प्याज १ छोटा, पिसा लाल मिर्च आधा चम्मच ,१,२ हरी मिर्च बारीक कटे हुवे, तेल तलने के लिये और बेसन फेंटने के लिये पानी
विधी- अगुर के पत्ते को सबसे पहले धो ले,फ़िर १ बडे बर्तन मे बेसन ले,अब इसमे बारीक कटा प्याज डाले,बारीक कटा मिर्च,नमक ,पिसा मिर्च डाले और इसमे पानी डालकर पकोड़े के लिये घोल तैयार करे,
अब कढाही मे तेल करके गर्म करें।
गरमा गरम पकोड़े तले।
टमाटर की चटनी के साथ इसका भोग लंगाये।


कैसे लगे निचे टिप्पणी मे बतायें।

बुधवार, 1 अक्टूबर 2008

शिक्षिका के रूप मे पहला दिन

यह उन दिनो का सस्मरण है जब मेरी नियुक्ति छत्तीसगढ़ मे शिक्षिका से रूप मे हुयी थी। हम लोग उन दिनो सपरिवार राजनांदगांव मे रहते थे ,लेकिन मेरी नियुक्ति राजनांदगांव से २०० किमी दूर कवर्धा जिले की बोढला तहसील के एक गांव माणिकपूर गांव मे हुयी थी।मुझे राजनांदगांव से माणिकपूर पहुचने मे ६ घण्टे लग जाते थे। २०० किमी की दूरी और ६ घण्टो को , शरीर के अस्थीपंजर हिला देने वाला सफर।
गनिमत यह थी कि बोढला मे मेरे छोटे मामा (रवि मामा से छोटे)रहते थे। बोढला से मुझे बस से १० किमी पोढी गांव जाना था, वहां से सायकिल या बैलगाड़ी द्वारा ५ किमी माणिकपूर स्कूल। रास्ते मे भारतिय ग्रामीण जिवन (आदीवासी जिवन) के दर्शन होते थे। बंदर , सांप और जगंली जानवरो का दिखना आम बात थी।
पहले दिन स्कूल मै अपनी मम्मी के साथ गयी थी। मम्मी वहां के हालात देख कर परेशान थी।
मेरी मुलाकात प्राथमिक शाला के प्रधानाध्यापक से हुई। वही माध्यमिक शाला के प्रभारी थे। उस दिन मेरे साथ दो शिक्षक ओर आये थे। सबसे ज्यादा खुश हमारे आने से प्राथमिक शाला के प्रधानाध्यापक थे,क्योकि पिछ्ले कुछ सालो से दोनो स्कुल का भार था। वो मुझे जल्दी से जल्दी माध्यमिक शाला के प्रभार देने मे लगे थे। पर मैने कहा अभी कुछ दिन बाद लुगी,पहले मुझे सब कुछ समझने दिजिये,कि कैसे स्कुल सम्भालना है।
पहले दिन मुझे याद है,मेरे एक सहकर्मी शिक्षक ने ने कहा "कुर्सी लिजिये मैडम बैठीये"। मै वहा चुपचाप बैठ गई। थोड़ी देर बाद एक शिक्षक और आये। आते साथ उन्होने बच्चो को जोर से आवाज लगाई गई "एक कुर्सी और लावो।" मुझे अच्छा नही लगा ,बच्चो से काम।थोड़ी देर मे मुझसे उन्होने मुझसे पूछा "मैडम चाय लेगी"।चुकि मै मना नही कर सकती थी,मना करने पर उन्हे बुरा लगता ,मैने पुछा बनाएगा कौन,तब उन्होने जवाब दिया "बच्चे और कौन ? यहां चपरासी नही है।"
प्रधानाध्यापक से मैने पुछा " कल कितने बजे आना है ?"
उन्होने कहा "वैसे तो समय तो १०.३० से ४.३० तक का है लेकिन तुम्हे अपना समय खुद तय कर लो। माध्यमिक शाला को मुझे तथा एक और सहकर्मी शिक्षक को सम्हालना रहता था, इसलिये मै शाला जल्दी बंद कर देता था। मेरे पास स्कूल के अतिरिक्त और भी कार्य होते है जैसे जनगणना, चुनाव कार्य, मतदाता सूची बनाना, गरिबी रेखा, राशन कार्ड वगैरह वगैरह। इन सब से समय बचे तो बच्चो को पढा़ दो। दो शिक्षकों से पूरा स्कूल सम्हलता नही इसलिये हम शाला जल्दी बंद कर देते है।"
मैने पुछा "बच्चो की पढायी कैसे होती है फिर ?"
प्रधानाध्यापक "भगवान भरोसे! परीक्षा के समय २ महिने पहले गांव के कुछ बेरोजगार शिक्षित युवक आकर पढाने मे मदद कर देते है! अब तुम आ गयी हो तो कुछ हालत सुधर जायेगी!"
एक दिन ऐसे ही शाम को ४.३० को छुट्टी हुयी, सब अपने घर को चले। पर प्रधानाध्यापक कुछ जरुरी काम करने मे व्यस्त थे। हम लोगो ने देखा वे घर नहि जा रहे है। हम लोग भी उनके साथ रोज उनके काम मे हाथ बटाने लगे। उसके बाद अब उन्हे भी बच्चो को पढाने के लिये समय मिल जाता था।
वहां आसपास के सभी स्कूलो की हालत ऐसे ही थी(है)। हर स्कूल मे जितनी कक्षाये उससे आधे शिक्षक। बच्चो की पढायी मे दयनिय दशा। आठंवी कक्षा मे पहुचने के बाद भी उन्हे ढंग से हिन्दी लिखना पढ़ना नही आता था। गणित, विज्ञान और अंग्रेजी की बात ही मत पुछीये।
चपरासी के अभाव मे शिक्षको ओर बच्चो को सारा काम खुद से करना पड़ता था। स्कूल की साफसफाई, झाड़ू लगाना, पानी भरनासभी कुछ बच्चो करते थे। शिक्षक गण भी अपने निजी कार्य जैसे चाय बनाना उन्ही से करवाते थे।
स्कूल की हालत देख कर रोना आता था। ऐसे मे एक दिन मैने बच्चो से कहा कि कल स्कूल मे रंगोली की प्रतियोगीता है। सभीको तैयारी करके आना है।
दूसरे दिन बच्चो को देखकर मै हैरान ! बच्चे अपने साथ स्केच पेन और रंगीन पेंसील ले कर आये थे। उन्हे चित्रकला और रंगोली का अंतर नही मालूम था। ऐसे थे ये बच्चे। तब मै खुद जाकर रंगोली के रंग खरीदकर लायी। कुछ बच्चो को घर से चावल का आटा लाने कहा। अब उन्हे कहा कि जो तुम अपनी कापी मे बना रहे हो उसे आटे और रंग से जमीन पर बनाओ।
कुछ बच्चे डर से कुछ नही बना पा रहे थे। लेकिन बाकि बच्चो ने जो कुछ बनाया , वह देख कर मै दंग थी। बच्चो ने अपनी सारी दूनिया जमिन पर उकेर दी थी। रेखाओ और रंगो का एक अद्भूत संयोजन जमीन पर था। मुझे विश्वास नही हो रहा था कि ढंह से हिन्दी नही लिखपाने वाले, २ का पहाड़ा ना जानने वाले ये बच्चे इतनी अच्छी रंगोली बना सकते है।
मेरा मन से अब निराशा दूर हो चुकी थी। ।इनमे प्रतिभा की कमी नही है, जरूरत है इन बच्चो को जरूरत है सही मार्गदर्शन की।

रविवार, 24 अगस्त 2008

एक लघु कथा

"नमक कहां है,अन्शु नमक कहां है?"
"मम्मी वहीं तो है!"
"मुझे प्याज भी नही मिल रहा है,चल आकर बता कहा है ? और जरा मेरे साथ रोटी सेकने मे मेरी मदद कर!"
"मम्मी! मुझे बहुत सारा होमवर्क भी करना है ,बार बार क्यो उठाती हो!"
"अरे लड़की की जात काम नही करेगी तो क्या करेगी ? शाला मे क्या करती है?"
"मम्मी कितनी भी पढाई शाला मे हो होमवर्क तो घर मे ही आकर करना होता है, आज मै कुछ नही कर सकती मुझे बहुत सारा होमवर्क करना है!"
"अब बहाने मत बना काम के समय ही तुझे पढाई दिखता है सारा दिन क्या करती है?"
"मम्मी आप मुझे समय दोगी तो मै पढुंगी ना! सुबह उठो, पानी भरो, रोटी बनावो फ़िर ट्युशन जाओ! वहां से आओ शाला जाने को तैयार हो ,फ़िर ५ बजे शाला से आओ और ट्युशन जावो,फ़िर रात का खाना बनवो ओर सबको खाना खीलाओ। घर मे कौन सी चिज कहां रखी है वो सब मुझे इस होमवर्क से ज्यादा मालूम है। धनिया मिर्च मसाला सब पता होता है ,पर कब क्या पढना है वो याद नही है?"
"लड़की की जात जबान चलाती है? चल चुप चाप काम कर !"
---------------------------------------------------------
"निता कैसी हो?"
"अन्शु, आजकल तुझे क्या हो गया है? कल शाला क्यो नही आयी थी ?"
"कल मेरे यहा काम वाली नही आइ थी काम कर रही थी !"
"क्यो मम्मी क्या कर रही थी?"
"मम्मी नौकरी करती है ना!"
"पर अन्शु तेरी पढाई ,पहले तु कक्षा मे प्रथम आती थी। अब तो तु क्या कर रही है ?"
"निता, समय निकाल कर पढती हूं पर घर का इतना सारा काम होता है, सारा समय वहीं चला जाता है,काश मै पहले जैसे छोटी होती कोई काम नही होता सारा दिन पढाई करती होती।"
---------------------------------------------------------
"मम्मी मुझे इंजीनियरिंग करनी है, फार्म भरने पैसे चाहीये।"
"कोई इंजीनियरिंग नही करना है, लड़कियो को बाहर पढने भेजना हमारे बुते की बात नही हओ। हमारे पास इतना पैसा नही है। फिर तेरी शादी भी करनी है, बहुत पैसा खर्च होगा। चुपचाप बी ए कर! ज्यादा से ज्यादा बी एस सी कर ले।"
"मम्मी लेकिन भैया इंजीनियरिंग करेगा तो मै क्यो नही ?"
"वो लड़्का है , तु लड़की है। तु इंजीनियरिंग करेगी तो तेरे लिये लड़्का भी तो इंजिनियर ढुंढना पड़ेग।इतना पैसा नही है हमारे पास। अब रोना धोना छोड़ ! भैया अभी क्रिकेट खेल आने वाला होगा। उसके लिये चाय बना। "

सोमवार, 11 अगस्त 2008

पहला चिठ्ठा

आज ऐसे ही बैठे बैठे सोचा की हमारे मामा तो हिन्दी चिठ्ठा जगत के पितामह हैं हमने भी सोचा की चलो हम भी चिठ्ठा लिखें और हम आ गए अपना चिठठा लेकर
अब जब भी मन होगा तो हम भी कभी कभी अपने मन की भड़ास निकाला करेंगें। अब आपको झेलना है झेलिये ! अच्छा लगे तो टिप्पणी भी दिजीये !
अभी के लिये सभी को हमारी राम राम !